06- भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ NCERT Geography Notes (Class 11)

 06- भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

Geomorphic Processes)



भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ(Geomorphic Processes) के ये नोट्स Class 11 NCERT Geography के अनुसार तैयार किये गये है ये नोट्स न केवल छात्रो के लिए बल्कि UPSC,SSC,CTET,REET,NET, Senior Teacher  , Lecturer परीक्षाओ की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है । इसमे अंतर्जनित बल, अपक्षय, बृहद् क्षरण, अपरदन और निक्षेपण के बारे में विस्तृत रूप से बहुत ही सरल भाषा में समझाया गया है-

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 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ क्या हैं?

Ø धरातल के पदार्थों पर अंतर्जनिक और बहिर्जनिक बलों द्वारा भौतिक दबाव तथा रासायनिक क्रियाओं के कारण भूतल के विन्यास में परिवर्तन को भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ कहते हैं।  अर्थात

पृथ्वी के धरातल का स्वरूप कभी एक जैसा नहीं रहता। इसमें निरंतर परिवर्तन होता रहता है। इन परिवर्तनों को लाने वाली क्रियाओं को भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ कहते हैं। 

भू-आकृतिक कारक (Agent) -

  • कोई भी गतिशील माध्यम जो पदार्थों को हटाता है - जैसे - प्रवाहित जल, हिमानी, हवा, लहरें, भूमिगत जल।

भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने वाले कारक -

  •        जलवायु- वर्षा और तापमान पर निर्भर। जैविक, भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाओं पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालती है।
  •       स्थलाकृति- अलग-अलग जलवायु वाले प्रदेशों में विभिन्न जलवायवी तत्त्व - जैसे- ऊँचाई में अंतर, दक्षिणमुखी ढालों पर धूप और पवनमुखी ढालों की अपेक्षा अधिक सूर्यताप।
  •    भू-आकृतिक प्रदेश- पुनरावृत्ति, वायु का वेग एवं दिशा, वर्षण की मात्रा एवं प्रकार, इसकी गहनता, वाष्पीकरण, हिमकरण, तुषार क्रिया (Frost) और हिमपात आदि।
   

भू-आकृतिक बलों के प्रकार-

1                    अंतर्जनिक बल (Endogenic Forces)-

·        पृथ्वी के आंतरिक भाग से उत्पन्न होते हैं। ये धरातल पर विषमता (ऊँचाई) बनाते हैं। जैसे - पर्वत निर्माण, ज्वालामुखी, भूकंप।

 

2                  बहिर्जनिक बल (Exogenic Forces)-

·        सूर्य की ऊर्जा और वायुमंडल से उत्पन्न होते हैं। ये धरातल की विषमता को दूर करके समतल बनाते हैं। जैसे - अपक्षय, अपरदन।

·        सभी बहिर्जनिक प्रक्रियाओं को एक साथ अनाच्छादन (Denudation) कहा जाता है, जिसका अर्थ है - आवरण का हटना।


  •  अंतर्जनिक बल + बहिर्जनिक बल = धरातल पर संतुलन बनाने की कोशिश

 अंतर्जनिक प्रक्रियाएँ(Endogenic Processes)

  •         पृथ्वी के अंदर से निकलने वाली ऊर्जा से उत्पन्न।
  •        अंतर्जनिक प्रक्रियाएँ की उर्जा का स्रोत रेडियोधर्मी क्रियाओं, घूर्णन (Rotational) एवं ज्वारीय घर्षण तथा पृथ्वी की उत्पत्ति से जुड़ी ऊष्मा।

 1.पटल विरूपण (Diastrophism)-

·                       सभी प्रक्रियाएँ जो भू-पर्पटी को संचालित, उत्थापित तथा निर्मित करती हैं।

       इसमें 4 बातें शामिल हैं-

                                                     i.        तीक्ष्ण बलन के माध्यम से पर्वत निर्माण

                                                    ii.        धरातल के बड़े भाग का उत्थापन या विक्षेप से महाद्वीप रचना

                                                   iii.        अपेक्षाकृत छोटे स्थानीय संचलन के कारण उत्पन्न भूकंप

                                                  iv.        प्लेटों के क्षैतिज संचलन में प्लेट विवर्तनिकी की भूमिका

  •               प्लेट विवर्तनिकी / पर्वतनी की प्रक्रिया में भू-पर्पटी बलन के रूप में तीव्रता से विकृत हो जाती है।

ü               पर्वतनी (Orogeny) - पर्वत निर्माण प्रक्रिया 


   ü    वलन(Folding) और भ्रंशन (Faulting) जिससे हिमालय जैसे पर्वत बनते हैं।

ü             महाद्वीप रचना (Epeirogeny) - महाद्वीपों का उत्थान/अवतलन

   2.ज्वालामुखीयता (Volcanism)-

·        पिघली हुई शैल या लावा (Magma) का भूतल की ओर संचलन एवं अनेक आंतरिक तथा बाह्य ज्वालामुखी स्वरूपों का निर्माण।

बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ (Exogenic Processes)- 


 👉⮚बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाए अपनी उर्जा सूर्य द्वारा निर्धारित वायुमंडलीय ऊर्जा एवं विवर्तनिक कारकों से उत्पन्न प्रवणता से प्राप्त करती है।

·                 गुरुत्वाकर्षण बल- ढालयुक्त सतह वाले धरातल पर कार्यरत रहता है तथा ढाल की दिशा में पदार्थों को संचालित करता है। इसे ढाल तनाव भी कहते हैं।

 

·               इसके कारण 2 प्रकार के प्रतिबल (Stress) बनते हैं-

        1. धक्का एवं खिंचाव (Push and Pull) - पदार्थ टूटता है

        2. अपरूपण प्रतिबल (Shear Stress) - पदार्थों का अपवाह होता है।

 

·                 👉  सभी बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को एक सामान्य शब्दावली अनाच्छादन (Denudation) कहते हैं। जिसका अर्थ है - निरावृत करना(Strip off)या आवरण हटाना ।

     अपक्षय (Weathering) -

·                            वायुमंडलीय तत्वों द्वारा धरातल के चट्टानों का अपने ही स्थान पर यांत्रिक विखंडन (Mechanical) एवं रासायनिक वियोजन (Decomposition) अपक्षय कहलाता है। अर्थात पदार्थों का अपने स्थान पर टूटना-फूटना अपक्षय कहलाता है।

·                           यह स्वस्थाने (In-situ) या तदस्थाने प्रक्रिया है। इसमें पदार्थों का परिवहन नहीं होता। 


    अपक्षय के प्रकार-

    रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाएँ (Chemical Weathering Processes) -


             ·        रासायनिक क्रिया द्वारा चट्टानों का विघटन रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाएँ कहलाती है   जैसे - विलयन, कार्बोनेटीकरण, जलयोजन, ऑक्सीकरण ।

             ·        ऑक्सीकरण, कार्बनिक अम्ल, जल, वायु और अन्य अम्लों की प्रक्रिया द्वारा चट्टानों का न्यूनीकरण होता है।

ü विलयन (Solution)- पानी में खनिजों का घुलना।

ü कार्बोनेटीकरण- CO2 मिला पानी चूना पत्थर को गला देता है।

ü ऑक्सीकरण- लोहे में जंग लगना।

     भौतिक अपक्षय प्रक्रियाएँ (Physical Weathering Processes)-


·        यांत्रिक या भौतिक क्रियायो द्वारा चट्टानों का टूटना भौतिक अपक्षय प्रक्रियाएँ कहालती है

·        इनमें भौतिक अपक्षय प्रक्रियाओं में अधिकांश तापीय विस्तार एवं दबाव के निर्मुक्त होने (Release) के कारण होता है। बार-बार संकुचन एवं विस्तारण के कारण शैलों के सतह तनाव (Fatigue) के फलस्वरूप शैलों को बड़ी हानि पहुँच सकती है।

·        जैसे-दिन में गर्मी से फैलना और रात में सर्दी से सिकुड़ना,चट्टानों की दरारों में पानी जमने से उनका टूटना।

 

     जैविक अपक्षय(Biological Weathering Processes)-


                     ·        जीव-जंतुओं और पौधों द्वारा चट्टानों का टूटना जैविक अपक्षय  कहलाता है ।

                     ·        पौधों की जड़ों द्वारा चट्टानों को तोड़ना,केंचुए, दीमक, चूहों द्वारा बिल बनाना,मानव द्वारा खनन, वनों की कटाई आदि जैविक अपक्षय का कारण है।

    अपक्षय का महत्व- 


                      ·        अपक्षय मृदा निर्माण के लिए जरूरी।

                      ·        वृहत् संचलन और अपरदन के लिए सामग्री तैयार करना।

                      ·        खनिजों का समृद्धीकरण (Enrichment)

Ø            वृहत् संचलन (Mass Movement)


·        गुरुत्वाकर्षण के सीधे प्रभाव में ढाल के सहारे पदार्थों का संचलित होना वृहत संचलन कहलाता है

·        कारण- तीव्र ढाल, अधिक वर्षा, भूकंप, वनस्पति का न होना।

            वृहत् संचलन के रूप-

·                                                   मंद संचलन - मृदा सर्पण(Creep)

·                                                 तीव्र संचलन - भूस्खलन (Landslide)

·                                                कीचड़ प्रवाह(Mudflow), मृदा प्रवाह

·                                               अवपात (Slump) - पदार्थों का घूर्णन के साथ खिसकना

·                                               फिसलन (Sliding)

·                                             शैल पतन (Rock Fall) - सीधे शैल का गिरना

ü           भूस्खलन (Landslide)- 

       जब शैल मलबा तेज गति से ढाल के नीचे खिसकता है। गुरुत्वाकर्षण बल के कारण चट्टानों और मिट्टी का ढाल के सहारे नीचे की ओर खिसकना।

 

ü भारत में भूस्खलन हिमालय क्षेत्र में अधिक होता है क्योंकि हिमालय एक नवीन वलित पर्वत है और यहाँ ढाल तीव्र है।इसके अलावा भारत में पश्चिमी घाट और नीलगिरि की पहाड़ियां भी इससे परभावित है।

   अपरदन (Erosion)-

     ·        शैलों के मलबे की अवाप्ति (Acquisition) एवं उनके परिवहन को सम्मिलित किया जाता है। अपक्षय से टूटे हुए पदार्थों को बहते हुए जल, हिमानी, पवन, समुद्री लहरों द्वारा बहाकर ले जाना अपरदन कहलाता है । यह एक गतिशील प्रक्रिया है।

     ·        इसमें गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) से काम होता है।

   निक्षेपण-

     ·        ढाल में कमी के कारण जब अपरदन के कारकों के वेग में कमी आती है तो निक्षेपण प्रारंभ हो जाता है। पहले स्थूल तथा बाद में सूक्ष्म पदार्थ निक्षेपित (Deposited) होते हैं। । इससे अवसादी स्थलाकृतियाँ (Depositional Landforms) बनती हैं

    ·        उदाहरण- नदी द्वारा बनाए गए - जलोढ़ मैदान, डेल्टा।  पवन द्वारा बनाए गए - बालुका स्तूप (रेत के टीले)।

v                  👉अपक्षय + वृहत् संचलन + अपरदन = अनाच्छादन

    मृदा निर्माण (Soil Formation) –

ü मृदा निर्माण का जिस विषय में अद्ययन किया जाता है उसे मृदा विज्ञान (Pedogenesis )कहते है  

ü मृदा अपक्षय का परिणाम है।

ü मृदा एक गत्यात्मक माध्यम है जिसमें बहुत से रासायनिक, भौतिक एवं जैविक क्रियाएं अनवरत चलती रहती हैं।

 

ü मृदा निर्माण की प्रक्रिया (Process of Pedogenesis)-

 

·        सर्वप्रथम अपक्षय द्वारा पदार्थों की गहराई ही मृदा निर्माण का मूल निवास होता है। बाद में जैव पदार्थ का संग्रह, फिर निक्षेपण, फिर सूक्ष्म जीवों द्वारा उपनिवेशित किया जाता है।    अर्थात

·        मृदा निर्माण की प्रक्रिया-  अपक्षय ह्यूमस का बनना सूक्ष्म जीवों द्वारा पदार्थों का स्थानांतरण मृदा का विकास।

ü                                  मृदा निर्माण के 5 कारक-


                                             i.        मूल पदार्थ (Parent Material)- जिस चट्टान से मृदा बनी है।

                                            ii.        स्थलाकृति (Topography)- तीव्र ढाल पर पतली और समतल जगह पर मोटी मिट्टी बनती है।

                                           iii.        जलवायु (Climate) - सबसे महत्वपूर्ण सक्रिय कारक। तापमान और वर्षा मृदा को निर्धारित करती है।

                                          iv.        जैविक क्रियाएँ (Biological)- जीव-जंतुओं और वनस्पति का योगदान।

                                           v.        समय (Time)- मृदा बनने में लगने वाला समय।

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👉👉भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ 

 

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