03-जलवायु NCERT Geography Notes (Class 11)

                                                                            जलवायु



   मौसम तथा जलवायु में अंतर -

   मौसम - 

  • वायुमंडल की क्षणिक अवस्था है। जल्दी-जल्दी बदलता है। एक दिन या एक सप्ताह में भी बदल सकता है।किसी छोटे क्षेत्र की अल्पकालिक दशा बताता है।
  • उदाहरण - आज दिल्ली में तापमान 40°C है और बारिश हो रही है।

   जलवायु- 

  • लंबे समय तक की मौसमी दशाओं का औसत है।बदलाव 30-35 वर्ष या इससे भी अधिक समय में होता है।किसी बड़े क्षेत्र की दीर्घकालिक प्रकृति बताता है।
  • उदाहरण - भारत की जलवायु उष्ण मानसूनी है।

  भारत की जलवायु -

·          ➤ भारत की जलवायु उष्ण मानसूनी है।

  👉मानसून का अर्थ

·           मानसून शब्द अरबी शब्द मौसिम से बना है जिसका अर्थ ऋतु होता है। ऐसी जलवायु जिसमें ऋतु के अनुसार पवनों की दिशा में उत्क्रमण हो जाता है। गर्मियों में पवनें समुद्र से स्थल की ओर तथा सर्दियों में स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं।

 भारत की जलवायु में एकरूपता एवं विविधता -

   एकरूपता -

·         मानसूनी पवनों की व्यवस्था पूरे भारत में एक लय प्रदान करती है। प्रादेशिक विभिन्नता के बावजूद सभी राज्यों की जलवायु मानसून प्रकार की है। यह मानसून भारत और दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में एकता को बल देता है।

  विविधता- 

·         भारत में जलवायु की प्रादेशिक विविधता तापमान, पवनों तथा वर्षा के आधार पर देखी जा सकती है। 

   तापमान में विविधता -

·         गर्मियों में पश्चिमी राजस्थान में तापमान 50°C तक पहुँच जाता है, जबकि सर्दियों में लद्दाख के द्रास में तापमान -45°C तक गिर जाता है।

·         जून के महीने में चुरू में दिन का तापमान 50°C से अधिक हो सकता है, जबकि उसी दिन अरुणाचल प्रदेश के तवांग में तापमान मुश्किल से 19°C तक पहुँचता है।

·         दिसंबर की रात में द्रास में तापमान -45°C हो सकता है, जबकि उसी रात तिरुवनंतपुरम या चेन्नई में तापमान 20-22°C रहता है।

·          केरल और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में दिन-रात के तापमान में 7-8°C का अंतर रहता है, जबकि थार मरुस्थल में यह अंतर 30-35°C तक होता है।

   वर्षा में विविधता-

·         हिमालय में वर्षण मुख्यतः हिमपात के रूप में होता है, जबकि देश के अन्य भागों में जल की बूंदों के रूप में वर्षा होती है।

·         मेघालय में स्थित मासिनराम( में औसत वार्षिक वर्षा 1080 सेमी से अधिक है, जबकि राजस्थान के जैसलमेर में यह 10 सेमी से भी कम है।

·          मेघालय की गारो पहाड़ियों में स्थित तुरा में एक ही दिन में उतनी वर्षा हो जाती है, जितनी जैसलमेर में 10 वर्षों में भी नहीं होती।

·         जुलाई-अगस्त में गंगा डेल्टा और ओडिशा के तटीय भागों में हर तीसरे-पाँचवें दिन चक्रवाती तूफान मूसलाधार वर्षा लाते हैं, जबकि इसी समय तमिलनाडु का कोरोमंडल तट शांत एवं शुष्क रहता है।

·          देश के अधिकांश भागों में वर्षा जून से सितंबर के बीच होती है, जबकि तमिलनाडु के तटीय प्रदेशों में शरद ऋतु यानी अक्टूबर-नवंबर में वर्षा होती है।

     ➤ इन सभी विविधताओं के बावजूद भारत की जलवायु अपनी लय और विशिष्टता में मानसूनी है।

   भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक -

    1. अक्षांशीय स्थिति

·         कर्क रेखा भारत के मध्य से गुजरती है। कर्क रेखा के दक्षिण का भाग उष्ण कटिबंध में आता है। यह भूमध्य रेखा के निकट होने के कारण साल भर उच्च तापमान और कम दैनिक वार्षिक तापांतर का अनुभव करता है।

·         कर्क रेखा के उत्तर का भाग शीतोष्ण कटिबंध में आता है। भूमध्य रेखा से दूर होने के कारण यहाँ उच्च दैनिक एवं वार्षिक तापांतर के साथ विषम जलवायु पाई जाती है।

    2. हिमालय पर्वत -

·         भारत के उत्तर में स्थित हिमालय जलवायु विभाजक की भूमिका निभाता है।

·         यह मध्य एशिया से आने वाली ठंडी और शुष्क पवनों से भारतीय उपमहाद्वीप की रक्षा करता है।

·          यह मानसूनी पवनों को रोककर भारत में वर्षा का कारण बनता है।

    3. जल एवं स्थल का वितरण -

·         भारत के दक्षिण में तीन ओर हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी स्थित हैं।

·         जल स्थल की अपेक्षा देर से गर्म और देर से ठंडा होता है।

·         जल एवं स्थल के इसी विभेदित तापमान के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में विभिन्न ऋतुओं में विभिन्न वायुदाब के क्षेत्र विकसित होते हैं।

    4. समुद्र तट से दूरी-

·         लंबी तटीय रेखा के कारण तट के आसपास के क्षेत्र समुद्र के समकारी प्रभाव में रहते हैं। यहाँ दैनिक और वार्षिक तापांतर कम होता है और ऋतु परिवर्तन बहुत स्पष्ट नहीं होता। जबकि आंतरिक/उत्तरी भारत महाद्वीपीय प्रभाव के कारण विषम जलवायु वाला होता है तथा स्पष्ट ऋतु परिवर्तन का अनुभव करता है।

     5. समुद्र तल से ऊंचाई -

·         ऊंचाई के साथ तापमान घटता है। सामान्यतः 165 मीटर की ऊंचाई पर 1°C यानी 1000 मीटर पर 6°C तापमान कम हो जाता है। इसी कारण पर्वतीय प्रदेश मैदानों की तुलना में अधिक ठंडे होते हैं।

·         उदाहरण: आगरा और दार्जिलिंग एक ही अक्षांश पर स्थित हैं, किंतु जनवरी में आगरा का तापमान 16°C जबकि दार्जिलिंग का तापमान 4°C होता है, क्योंकि दार्जिलिंग अधिक ऊंचाई पर स्थित है।

     6. उच्चावच / पर्वतों की स्थिति -

·         उच्चावच तापमान, वायुदाब, पवनों की गति-दिशा तथा वर्षा की मात्रा और वितरण को प्रभावित करता है।

·         उदाहरण: जून-जुलाई में पश्चिमी घाट का पवनमुखी ढाल तथा असम की पहाड़ियाँ अधिक वर्षा प्राप्त करती हैं, जबकि पश्चिमी घाट का वृष्टि-छाया प्रदेश यानी पवन विमुख ढाल कम वर्षा प्राप्त करता है।

·         राजस्थान का अरावली पर्वत मानसून की अरब सागर शाखा के समानांतर होने के कारण वर्षा नहीं करवा पाता।

·         लद्दाख क्षेत्र वृहत हिमालय के वृष्टि-छाया क्षेत्र में स्थित होने के कारण शुष्क रहता है।               

     अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) -

भूमध्य रेखा के निकट स्थित अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) एक निम्न वायुदाब क्षेत्र है। इस क्षेत्र में दोनों गोलार्धों की व्यापारिक पवनें आपस में मिलती हैं और वायु ऊपर उठने लगती है। इसे विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी भी कहते हैं।  गर्मियों में सूर्य के उत्तरायण होने पर ITCZ उत्तर की ओर खिसककर गंगा के मैदान तक पहुँच जाता है, जिससे मानसून पवनों का भारत में प्रवेश होता है।

     भारत में ऋतुओं का वर्गीकरण -

             मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में वर्ष को 4 ऋतुओं में बाँटा जा सकता है:

                       1.शीत ऋतु - दिसंबर से फरवरी 

                       2. ग्रीष्म ऋतु - मार्च से मई

                       3. दक्षिण-पश्चिम मानसून ऋतु - जून से सितंबर

                       4. मानसून की निवर्तन/लौटते मानसून की ऋतु -अक्टूबर से नवंबर

     शीत ऋतु -

     तापमान -  

  उत्तरी भारत में शीत ऋतु नवंबर से मार्च तक रहती है। जनवरी और फरवरी सर्वाधिक ठंडे महीने होते हैं।
 उत्तरी मैदान में अधिकांश भागों का औसत दैनिक तापमान 21°C से कम रहता है। रात का तापमान पंजाब, हरियाणा, राजस्थान में 0°C से भी नीचे चला जाता है।

 दक्षिणी भारत में प्रायद्वीपीय भारत में कोई निश्चित शीत ऋतु नहीं होती। तटीय भागों में समुद्र के समकारी प्रभाव तथा भूमध्य रेखा की निकटता के कारण ऋतु परिवर्तन स्पष्ट नहीं होता।

तिरुवनंतपुरम में जनवरी का माध्य अधिकतम तापमान 31°C रहता है जबकि जून में 29.5°C 

 

    उत्तरी भारत में अधिक ठंड के कारण -

1.      उत्तरी भारत  समुद्र के समकारी प्रभाव से दूर होने के कारण महाद्वीपीय जलवायु का अनुभव करते हैं।

2.       हिमालय श्रेणियों में हिमपात के कारण शीत लहर की स्थिति बनती है।

3.       फरवरी के आसपास कैस्पियन सागर और तुर्कमेनिस्तान से आने वाली ठंडी पवनें उत्तरी भारत में शीत लहर लाती हैं। ऐसे समय उत्तर-पश्चिमी भागों में पाला या कोहरा भी पड़ता है।

    वायुदाब तथा पवने -

·         शीत ऋतु में सूर्य दक्षिणायणहो जाता है तथा उत्तरी गोलार्ध में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं, जिससे उत्तर के मैदान में उच्च वायुदाब विकसित हो जाता है, जबकि दक्षिणी भारत में अपेक्षाकृत निम्न वायुदाब होता है।  परिणामस्वरूप उत्तर-पश्चिम उच्च वायुदाब क्षेत्र से दक्षिण में हिंद महासागर पर स्थित निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर पवनें चलने लगती हैं।  

·         कम वायुदाब प्रवणता के कारण 3-5 किमी/घंटा की गति से मंद पवनें चलती हैं, जिनकी दिशा भू-आकृति से प्रभावित होती है। गंगा के मैदान में इनकी दिशा पश्चिम तथा बंगाल की खाड़ी में स्पष्ट रूप से उत्तर-पूर्वी हो जाती है।  

·         सर्दियों में भारत का मौसम सुहावना होता है, जो कभी-कभी हल्के चक्रवाती अवदाब से बाधित होता है।

·         22 दिसंबर को सूर्य मकर रेखा पर लंबवत चमकता है।

   शीतकालीन वर्षा -

·         शीतकालीन पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं, अतः सामान्यतः वर्षा नहीं करतीं क्योंकि इनमें नमी कम होती है और घर्षण से तापमान बढ़ जाता है।

·         शीत ऋतु में पश्चिमी विक्षोभों से पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रबी के फसलों में होने वाली  वर्षा को इसे मावठ कहते हैं, जो रबी फसल के लिए बहुत उपयोगी है।

·          वर्षा की मात्रा मैदानों में पश्चिम से पूर्व तथा पर्वतों पर उत्तर से दक्षिण की ओर घटती है।

·         हिमालय में यह हिमपात के रूप में होती है, जो गर्मियों में नदियों में जल-प्रवाह बनाए रखती है।

    पश्चिमी विक्षोभ -

v  पश्चिमी विक्षोभ शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात भूमध्य सागर पर उत्पन्न होते हैं।

v  पूर्व की ओर चलते हुए पश्चिम एशिया, ईरान, अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान को पार कर उत्तर-पश्चिम भारत पहुँचते हैं। मार्ग में कैस्पियन सागर व फारस की खाड़ी से गुजरते समय इनकी आर्द्रता बढ़ जाती है।

v  पश्चिमी जेट प्रवाह पश्चिमी विक्षोभों को भारत की ओर उन्मुख करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

   पश्चिमी जेट प्रवाह / पश्चिमी जेट स्ट्रीम -

v  पश्चिमी जेट प्रवाह क्षोभमंडल  की उपरी सीमा  9-13 किमी पर चलने वाली अत्यंत तेज गति की हवाएँ हैं। इनकी गति 110 किमी/घंटा से 180 किमी/घंटा तक होती है।यह तिब्बत के पठार के समानांतर हिमालय के उत्तर में एशिया महाद्वीप पर चलती है इन्हे जेट प्रवाह के नाम से जाना जाता है।

v  तिब्बत की उच्च भूमि के कारण यह दो भागो में विभाजित हो जाता है शीत ऋतु में पश्चिमी जेट प्रवाह का एक प्रमुख शाखा हिमालय के दक्षिण में 25°-30° उत्तरी अक्षांश पर बहती है। यह शाखा पश्चिमी विक्षोभों को भूमध्य सागर से भारत तक लाने का कार्य करती है।

v  पश्चिमी जेट प्रवाह, पश्चिमी विक्षोभ को भारत की ओर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

v  यदि यह जेट प्रवाह कमजोर हो तो पश्चिमी विक्षोभ भारत नहीं पहुँच पाते और उत्तर भारत में सर्दी की वर्षा नहीं होती।

    उत्तर-पूर्वी मानसून -

·         उत्तरी –पूर्वी पवने बंगाल की खाड़ी  को पर करते समय नमी ग्रहण कर उत्तर-पूर्वी मानसून के रूप में कर तमिलनाडु, दक्षिण आंध्र प्रदेश, दक्षिण-पूर्व कर्नाटक व दक्षिण-पूर्व केरल में वर्षा करता है।

·         तमिलनाडु दक्षिण-पश्चिम मानसून से वंचित रहता है क्योंकि वह पश्चिमी घाट के वृष्टि-छाया क्षेत्र में स्थित है।

·         तमिलनाडु में शीत ऋतु में अक्टूम्बर –नवंबर में वर्षा होती है । 

   ग्रीष्म ऋतु-

    तापमान -

·         मार्च में सूर्य के उत्तरायण होने से उत्तर भारत में तापमान बढ़ने लगता है। 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत चमकता है।

·         उत्तर भारत में मार्च से जून तक ग्रीष्म ऋतु होती है।

·          ग्रीष्म ऋतु में सूर्य के उत्तरायण होने पर हिमालय के दक्षिण वाली जेट शाखा कमजोर होकर लुप्त हो जाती है और हिमालय के उत्तर में 35°-40° उत्तरी अक्षांश पर शिफ्ट हो जाती है। इसके हटने से ITCZ उत्तर की ओर खिसकता है और दक्षिण-पश्चिम मानसून का भारत में प्रवेश होता है।

·         दक्षिणी भारत में यहाँ ग्रीष्म ऋतु मृदु होती है। प्रायद्वीपीय भारत में समुद्र के समकारी प्रभाव के कारण तापमान उत्तर भारत जितना नहीं बढ़ता। दक्षिण में तापमान 26-32°C के बीच रहता है। पश्चिमी घाट के ऊँचे क्षेत्रों में ऊंचाई के कारण तापमान 25°C से भी कम रहता है। तटीय भागों में समताप रेखाएं तट के समानांतर उत्तर-दक्षिण दिशा में फैली होती हैं, जो दर्शाती हैं कि तापमान दक्षिण से उत्तर की ओर नहीं बल्कि तट से अंदर की ओर बढ़ता है। औसत न्यूनतम तापमान भी 26°C से नीचे शायद ही कभी जाता है।

   वायुदाब और पवने -

·         उत्तर भारत मई में में तीव्र गर्मी से वायुदाब कम हो जाता है। 20-25° उत्तरी अक्षांश पर निम्न वायुदाब पेटी  स्थापित हो जाता है, अर्थात ITCZ उत्तर की ओर खिंच जाता है और दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक पवनों को आकर्षित करता है।  

·         उत्तर-पश्चिम में ITCZ के कारण दोपहर बाद लू नामक शुष्क एवं गर्म  हवाएँ चलती हैं, जो कई बार आधी रात तक चलती रहती हैं। मई में शाम के समय पंजाब, हरियाणा, पूर्वी राजस्थान और उत्तर प्रदेश में धूल भरी आंधियाँ आम हैं। ये अस्थाई तूफान गर्मी से राहत दिलाते हैं क्योंकि हल्की बारिश और शीतल हवा लाते हैं। 

  ग्रीष्म ऋतु के प्रसिद्ध स्थानीय तूफान -

Ø         आम्र वर्षा -

ग्रीष्म ऋतु के अंत में केरल और तटीय कर्नाटक में होने वाली मानसून पूर्व बौछारें। यह आमों को जल्दी पकाने में सहायक हैं।

Ø     फूलों वाली बौछार / ब्लॉसम शावर - 

केरल और निकटवर्ती कहवा उत्पादक क्षेत्रों में कहवा के फूल खिलाने वाली वर्षा।

Ø        काल बैसाखी -

असम और पश्चिम बंगाल में वैशाख के महीने में शाम को चलने वाली भयंकर व विनाशकारी तूफानी वर्षा। असम में इन्हें बारदोली छीड़ा कहते हैं। ये चाय, जूट और चावल की फसल के लिए लाभदायक हैं।

Ø         लू - 

उत्तर के मैदान में पंजाब से बिहार तक चलने वाली शुष्क, गर्म व पीड़ादायक पवनें। दिल्ली और पटना के बीच इनकी तीव्रता अधिक होती है।


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